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क्या 'इस्लामिक-नाटो' बदलेगा समीकरण? राजनीति पर असर! [राजनीति, धर्म] Islamic Nato Geopolitical Implications
मध्य-पूर्व में 'इस्लामिक-नाटो' की चर्चा तेज है. SattaKiJung की रिपोर्ट के अनुसार, इस संभावित गठबंधन के भू-राजनीतिक निहितार्थ गंभीर हो सकते हैं. 1955 में सोवियत संघ के खिलाफ बगदाद पैक्ट बना, जिसमें इराक, तुर्किये, पाकिस्तान, और ईरान शामिल थे, बाद में यह सेंटो बना लेकिन 1979 में बिखर गया. 2015 में सऊदी अरब ने आईएसआईएस के खिलाफ इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन बनाया, जिसका नेतृत्व पाकिस्तानी जनरल राहील शरीफ ने किया. अब पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रणनीतिक रक्षा समझौता है, जो नाटो की तरह काम करेगा - एक पर हमला, सब पर हमला माना जाएगा. तुर्किये भी इसमें शामिल होने पर विचार कर रहा है. भले ही अभी कोई औपचारिक 'इस्लामिक-नाटो' न हो, लेकिन इसकी संभावना मात्र से ही वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल मच सकती है. इस घटनाक्रम पर दुनिया भर के देशों की नजर है, खासकर भारत की. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस संभावित गठबंधन का क्षेत्रीय स्थिरता और शक्ति समीकरणों पर क्या प्रभाव पड़ता है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और भी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं, क्योंकि इसका असर सीधे तौर पर बीजेपी और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की विदेश नीति पर पड़ेगा।
इस बीच, चुनाव की रणनीति में भी बदलाव की आशंका जताई जा रही है।
- 'इस्लामिक-नाटो' की चर्चा, भू-राजनीतिक निहितार्थ गंभीर हो सकते हैं।
- पाकिस्तान-सऊदी रणनीतिक रक्षा समझौता, नाटो की तरह काम करेगा।
- तुर्किये भी 'इस्लामिक-नाटो' में शामिल होने पर कर रहा है विचार।
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Posted on 25 January 2026 | Stay updated with sattakijung.com for more news.
